#मयंक की अभिलाषा...
- मयंक की अभिलाषा *
चाह नहीं मैं कोई बड़ी परीक्षा
उत्तीर्ण करके इतराऊँ l
चाह नहीं कोई अफसर बनकर,
अपना रौब जमा पाऊँ ।
चाह नहीं मैं बनूँ कोई नेता,
और कुर्सी पर बैठा खाऊँ।
ये मानुष जीवन दिया प्रभु ने,
निज करके मेहनत कमा पाऊँ ।
चाह नहीं मुझे धन-दौलत की,
सुख से दो-रोटी खा पाऊँ।
चाह नहीं गाड़ी- बंगले की,
एक छोटी सी कुटिया बना पाऊँ।
जहाँ व्यतीत हो सुख से दो पल,
ऐसा सुंदर जीवन देना ।
मृदु, सहज,सरल, संतोषी बनूँ
कुछ ऐसी कृपा मुझ पर कर देना।
हे नाथ! दयानिधि, मेरे परमेश्वर,
कण-कण में तेरा ठिकाना है।
कोई नहीं जगत में मेरा प्रभु,
बस तुझको ही अपना माना है..
मैंने तुझको ही अपना माना है।
रचनाकार :- डॉ. मयंकेश कुमार दुबे
(शिक्षक एवं लेखक)
एम.ए. इतिहास(गोल्ड मेडलिस्ट )
औलेंडा,आगरा, उत्तर प्रदेश
मो. :-8630291252
रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (2)
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सुप्रिया साहू said
बहुत सुंदर अभिलाषा, बहुत खूबसूरत रचना सर 👌👌, आपको सादर प्रणाम 🙏🙏।
सरिता पाठक said
बहुत सुन्दर अभिलाषा, 👌लाजवाब रचना आपको सादर प्रणाम 🙏
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