रात के दो बजे हैं, दिल फिर उदास है,
चेहरे पर ख़ामोशी, आँखों में प्यास है।
दिन भर सभी से कहती रही—सब ठीक है,
अपने ही दिल से मगर, कैसी ये रंजिश है?
जिसको सुनानी थी, उसी से छिपाया है,
जिसने रुलाया, उसी को मनाया है।
हर बार अपनी ही ग़लती बताती रही,
उसकी ख़ता पर भी पर्दे गिराती रही।
कितना अजीब है ये रिश्तों का कारोबार,
एक तरफ़ इंतज़ार, दूसरी तरफ़ इनकार।
हमने तो चाहा था बस इतना-सा साथ,
कोई तो पढ़ ले कभी आँखों की बात।
कोई तो पूछे कि थककर कहाँ जाएँगे,
हर रोज़ ख़ुद को भला कब तक समझाएँगे?
पर सबको हमारी हँसी पर यक़ीन था,
किसको ख़बर थी कि भीतर कितना ग़मगीन था।
अब कोई याद आए, तो आने दिया करें,
हर दर्द को ख़ामोशी में न बहने दिया करें।
जो लौटना चाहे, उसे रास्ता मिल जाएगा,
जो अपना नहीं, वह पास रहकर भी दूर जाएगा।
मत रो मेरे दिल, हर चाह मुकम्मल नहीं,
हर सच्चे प्रेम का मिलना भी हासिल नहीं।
कुछ लोग हमें जीना सिखाकर जाते हैं,
कुछ अपने होकर भी अजनबी बन जाते हैं।
अब अपनी ख़ुशी का किसी से सवाल क्या,
जो ख़ुद को न समझे, उससे कोई मलाल क्या?
रात बीत जाएगी, उजाला भी आएगा,
सूना पड़ा मन फिर कुछ गुनगुनाएगा।
बस एक बात गाँठ में बाँधकर रखना
किसी के लिए ख़ुद को अधूरा मत करना।
जिसे पाने में ख़ुद को ही खो दिया,
उसे पाकर भी क्या पाओगे?
जो घर तुम्हारे भीतर उजड़ गया,
किस दरवाज़े पर उसे बनाओगे?
मत रो मेरे दिल, अब लौट चलें घर,
बहुत भटक लिए हम किसी और के दर पर।
जिसे अपनी धड़कनों से ज़्यादा चाहा,
उसी ने हमें हमारी नज़रों से गिराया।
अब न उसकी राह तकेंगे, न फ़रियाद करेंगे,
जो हमें तोड़ गया, उसे क्या याद करेंगे?


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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