इश्क़ वालों ने क्या नहीं देखा,
जान दी और ख़ुदा नहीं देखा।
ज़ख़्म सीते रहे ख़मोशी से,
हमसे कोई जुदा नहीं देखा।
खून का एक-एक क़तरा बहा,
फिर भी कोई गिला नहीं देखा।
हाथ से सब गँवा के बैठे हैं,
ऐसा कोई गदा नहीं देखा।
इक फ़साना जो अनसुना ही रहा,
उसका कोई सिरा नहीं देखा।
आँसुओं की थी साँस भी अपनी,
दर्द का आतिश-कदा नहीं देखा।
दिल का साया ही दर्द बन के रहा,
साए का आसरा नहीं देखा।
तेरी बाहों में मर मिटे जो लोग,
उनका कोई बक़ा नहीं देखा।
ज़हर-ए-उल्फ़त भी हँस के पी डाला,
ऐसा कोई भला नहीं देखा।
हम तो तन्हाई में भी तन्हा थे,
ख़ुद सा कोई गदा नहीं देखा।
दिल को आज़ाद कर दिया आख़िर,
अब कोई रास्ता नहीं देखा।
ख़्वाब का सौदा कर लिया हमने,
नींद का सिलसिला नहीं देखा।
जब तलक साँस थी, किया बस इश्क़,
इश्क़ सिवा कुछ किया नहीं देखा।
राह-ए-उल्फ़त में जो लुटे 'ललित',
उनका कोई पता नहीं देखा।
रूह तक जल गई मोहब्बत में,
धुआँ उठते हुए नहीं देखा।
बे-दिली का ये हाल है अब तो,
सामने आईना नहीं देखा।
बिक गए हम तो मुफ़्त में आख़िर,
मिस्र का आशिया नहीं देखा।
बात करने का ढब नहीं उनको,
जिन्होंने दिल जला नहीं देखा।
मौत भी आ के लौट जाती है,
दर्द का मन्ज़रा नहीं देखा।
ज़िन्दगी एक ख़्वाब है शायद,
जाग कर भी जगा नहीं देखा।
अब तो उठते हैं इस महफ़िल से 'ललित',
मीर सा कोई दूसरा नहीं देखा।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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