मुखौटों का शहर और नंगे पैर
दीवारों से झड़ता चूना,
रातों का वो पहरा है,
इस साफ दिल के सीने में,
जख्म बहुत ही गहरा है।
सौ की भीड़ में अव्वल आया,
वो रुतबा भी तो मेरा था,
पर फटे जूतों से नंगे पैर,
शिक्षा-धाम का वो फेरा था।
चंद सिक्कों की खातिर जिसने,
उस दिन मेरा मान बिका,
एक सनद की आड़ में देखो,
गुरु का ही ईमान बिका।
पैर पड़े, हम हाथ जुड़े,
बस अपना हक पाने को,
क्या यही सिला मिलता है यहाँ,
एक सच्चे दीवाने को?
बाहर जाहिल पहरेदार,
जो थूक के कचरा करते हैं,
गाली बकते, शोर मचाते,
ओछेपन से भरते हैं।
लोहे के उस द्वार के पीछे,
एकांत जब रोता है,
एक माँ की बीमार देह,
दिन-रात कफ़न सी होती है।
अपनों का यह हाल कि देखो,
साया सिर से छूट गया,
पिता छोड़ गए ऋण का दलदल,
भाई का मन टूट गया।
त्योहार के दिन जो फोन पे रोए,
वो ज़हरीली रातें हैं,
मदद के बदले तीखे तानों की,
अपनों की वो बातें हैं।
लेन-देन का यह सौदा है,
यहाँ सात्विक प्रेम कहाँ?
इंसानियत तो मर चुकी है,
बस माया का वहम यहाँ।
दिखावे के इस पिंजरे में,
हर कोई अब यन्त्र बना,
हुनर दबा है मलबे नीचे,
जीवन एक संगीन बना।
पर्यावरण की चीखें देखो,
बेजुबानों का बहता खून,
स्वार्थ की उस क्रूरता में,
हँसता इंसानी जुनून।
सबके पीछे अहंकार खड़ा है,
सबको बस वैभव चाहिए,
इंसान यहाँ पर बचा कहाँ है,
सबको बस संचय चाहिए।
मन कहता है फट जाए धरती,
टुकड़े-टुकड़े हो जाए,
इस मतलबी भेड़चाल का,
नामो-निशान ही खो जाए।
पर रुका हुआ हूँ आज भी मैं,
उस माँ की ढाल बनने को,
अंधेरे कमरे के सन्नाटे में,
ज्ञान की वो मशाल बनने को।
मैं किसी से डरता नहीं,
न बर्बादी का खौफ कोई,
मैं अंततः एक इंसान हूँ,
न बिकने का शौक कोई।
ये पुराने कपड़े, फटे जूते,
मेरी हकीकत बयां करेंगे,
एक दिन इसी बंद कमरे से,
हम नया इतिहास खड़ा करेंगे।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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