मैं लहु से लिखु जो दास्ताँ,क्या मिट जायेंगे ज़ख्म सारे
भर आएंगे अश्क-ए-खूँ या फिर बह जायेंगे सितम सारे
सितम-ज़रीफी का क्या कहिये , ला-कलाम जुबाँ हुई
अज़ाब-ए-जाँ मुक़द्दर हुआ कैसे भूल पाएंगे ग़म सारे
इस ज़ालिम दुनिया में दिल-ए-दाग़-दार लगेगा कहाँ
दिल दुनिया सें बेज़ार हुआ ले जाओ ये तामज़ाम सारे
चलो माफ़ भी कर दूँ ग़र तुमकों फ़रेब-ए-मुहब्बत में
ज़ख्म-ए-कारी पऱ क्या असर कर जाएंगे मरहम सारे
दौर-ए-अज़ीयत का क्या कीजे, उमरे गुज़र गई जानाँ
लौटकर न आएंगे लम्हें और न लौट आएंगे भरम सारे
कृष्णा के हवाले सें भले थम ही जाए यहीं शब-ए-ग़म
ला-तअल्लुक़ी ऐसी हावी हुई बेकार जायेंगे मातम सारे..
- कृष्णा शर्मा
दिल-ए-दाग़-दार = ज़ख़्मी दिल, दौर-ए-अज़ीयत = अज़ीयत भरा दौर
,ज़ख्म-ए-कारी = ऐसा गहरा ज़ख्म जिससे जान भी ज़ा सकती हों,
ला-तअल्लुक़ी = उदासीनता


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







