कहते हैं —
स्त्री का सौंदर्य उसके मौन में है,
पर किसी ने पूछा —
उसका मौन किसने रचा है?
वो बोलना चाहती है,
पर शब्दों को सीमाओं ने बाँध रखा है।
वो उड़ना चाहती है,
पर परों को संस्कारों ने थाम रखा है।
कहा गया —
“घर की लक्ष्मी बनो”,
तो उसने घर संभाला,
कहा गया —
“मर्यादा में रहो”,
तो उसने सपनों को भी दीवारों में टाँग दिया।
वो जो रोटी बेलती रही,
वो जो हर त्याग में मुस्कुराती रही,
कभी सोचा है —
उसके भीतर कितनी कहानियाँ दबी होंगी?
उसकी चुप्पी में इतिहास लिखा है,
उसकी आँखों में भविष्य टिमटिमाता है।
उसने हर युग में खुद को गढ़ा है —
कभी माटी से, कभी आँसू से,
कभी राख से, कभी शब्द से।
वो बोलती है —
तो उसे “तेज़” कहा जाता है,
वो चुप रहती है —
तो “संस्कारी” कहलाती है।
हर हाल में निर्णय वही लेता है,
जो सुनता नहीं, बस सुनाता है।
पर अब वक्त बदल रहा है —
अब स्त्री प्रश्न नहीं, प्रतिवाद है,
अब वो कहानी नहीं, कथावाचक है,
अब वो मंच की दर्शक नहीं,
स्वर है, शब्द है, सत्ता है।
वो अब “माँ” कहलाकर सीमित नहीं होगी,
वो अब “देवी” बनकर पूजी नहीं जाएगी,
वो इंसान बनकर जीना चाहेगी —
साँस की तरह, स्वाभाविक, स्वतंत्र।
अब वो अपने मौन को तोड़ रही है —
हर बंद दरवाज़े पर एक दस्तक बनकर।
हर “ना” अब इज़हार है,
हर “हाँ” अब अधिकार है।
अब वो कहती है —
“मैं मौन नहीं हूँ,
मैं उस शोर की पहली गूँज हूँ,
जो सदियों से दबा था।
मैं वही हूँ,
जो कल तक दीवार थी,
आज दरवाज़ा हूँ।”
वो जो कल झुकी थी,
आज खड़ी है —
अपने ही नाम से,
अपने ही शब्दों से,
अपने ही आत्मविश्वास से।
हाँ, मैं स्त्री हूँ —
पर अब मैं किसी की प्रतीक्षा नहीं,
एक परिवर्तन हूँ।
मेरा मौन अब मौन नहीं,
क्रांति की शुरुआत है!
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The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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