जब चांद ना रहा पास तो तारों का क्या करूं,
जब मजनू ना रहा तो लैला बनके क्या करूं,
महफूज़ ना रख पाई अपने इश्क़ को,
तो फिर अब अश्क बहा कर क्या करूं...।।
गुनहगार बन गई नजरों से कुछ खोकर भी,
हो ना सकी हक़दार तेरे प्यार की तो क्या करूं,
उलझन में रहती हूँ हर वक्त बेवजह,
जब तक़दीर ही मैला निकला तो क्या करूं...।।
- सुप्रिया साहू


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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