मां
प्रातः दिवाकर की
रक्त- स्वर्णिम रश्मि - पुंज है
अपनी ममता की मंद आंच में
अंतर्निहित समग्र ऊर्जा - समंद
उड़ेल देती है, अपनी संतानों की
जीवन - धरा -पटल पर,
मां
तुंग - कोंख से निसरित
निश्छल निर्मल अविरल
कलकल जलधारा है
अपनी स्नेह- शैतल्य से
सदा सहलाती है
संतान - तरु- वृंद की
असंख्य अदृश्य अनंत
संस्कार - जड़ों की
सूक्ष्म - महीन शाखाओं को,
तब मुस्कातीं है
कर्म - किसलय, शाखाओं में
परिलक्षित होती है
उत्कर्ष - हरितिमा
त्याग -तप-संघर्ष -पुष्प की
सुरभि विसरित होती है
संतानों की जीवन -गगन में,
मां
पूनम निशा की,
गगन से धरती की ओर,
आती हुई,
चंद्र-प्रभा- वृष्टि है
स्वयं के परिवार के
गृहांगन को,
धवलित, प्रकाशित, आनंदित
करने, प्रतिज्ञाबद्ध है,
मां
सृष्टिकर्ता का
वह सृजन है,जिसका
स्वयं अनुकरण कर
वो पुनः नवसृजन करतें हैं
मां और ईश्वर में यही प्रतिस्पर्धा है।।
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







