मैं ये महफिल को बताने आता हूं,
जब खुद से पूछकर,
खुद ही को समझाने आता हूं,
और मेरा ये दरमियान औरों से होकर आता है,,
मैं ये तमाशा रोज करने आता हूं,
क्या लगता है औरों के पूछने पर ही,
क्या अपना हाल जानने आता हूं,
ये सवालों की खिड़की से,
अपने भीतर क्या टटोलने आता हूं,
मैं खोजने की जगह बस जवाब बन जाता हूँ,
अपनी हँसी से,
मुझे लगता है कि मैं मुस्कुराता हूं,
औरों के दरमियान से देखूँ खुद को,
मेरे अच्छे दिन है,
मैं इस पे भी हँस जाता हूँ,
खुद के लिए तब तो मैं खुदा भी बन जाता हूँ,
औरों के दरमियान से खुद के पास आएं तो,
मैं किसी काम का तो बन जाता हूँ।
चोट लगती है,
रोता हूँ,
तड़पता हूँ,
खुद के पास बहुत संवेदनशील हो जाता हूँ,
औरों के दरमियान से देखूँ, खुद देखूं तो,
मैं,
कमजोर, लाश, बिखरा, बुरे कामों का ढ़ेर,
आलसी, गलत संगति, संस्कार हीन,
लापरवाह , सब तरह से विलोम नज़र आता हूं,
मैं तब भी खुद ही खुद का हाथ पकड़ने आता हूं,
मैं साथ निभाने आता हूँ,
मैं खुद, खुद के पास रहूं तो,,
खुद से बहुत इतराता हूं ,
मैं खुद के ही नखरे बहुत उठाता हूँ,
औरों के दरमियान से देखूँ खुद तो,
खुद से बोलने पर,
खुद से बात करने पर,
खुद का ख्याल रखने पर मैं,
स्वार्थी, पागल और आत्ममुग्ध,
नीरस और उदासीन बन जाता हूँ,
मैं किसी भी भाषा या सोच से बोलूं तो,
सबकी चेतना में यही नज़र आता हूं।
मैं खुद से खुद दूर हो जाऊँ तो,
मैं तन्हा महफिल में चला जाता हूं,
और किसी सफ़र पे हो जाता हूँ,
औरों के दरमियान से देखूँ तो,
अब नहीं रहा,
राख हो जाता हूँ,
मैं गुमनाम खो जाता हूँ,
फिर तो कहीं पे नहीं,
किसी का नहीं हूँ,
मैं पूर्व हो जाता हूँ।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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