के ए जिंदगी तूने भगाया बहुत है
मंजिल तो मिली ना थकाया बहुत है
तुझे ईर्षा थी मेरे सीना तान कर चलने से
बोझ देकर जिम्मेदारियों का झुकाया बहुत है
देख कर मंजिल को कमाया बहुत है
फिर जानकार हाथों का मैल उड़ाया बहुत है
मेरे जनाज़े का कारवां देखकर मुंह ना छुपा
मैने अपने काम बिगाडकर समाज बनाया बहुत है
मेरी दूखी रगों को तूने दुखाया बहुत है
बनाकर साजिश कोई सताया बहुत है
समय चाहे सुख में गुजारा या दुख में
ए बेरहम कम्बखत तूने मुझे रुलाया बहुत है
एक बार तो सपने तुझ से छीन लिए थे मैने
तूने बहरूपिया बनकर मुझे घुमाया बहुत है
बहुत लिए होंगे तूने ज़माने में इम्तिहान
मुझ से तो तूने जोर आजमाया बहुत है
नीटू मावी


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







