कुछ न कहने की आदत-सी हो गई है,
चुप रहने की आदत-सी हो गई है।
लबों पर अब कोई शिकायत नहीं रहती,
शायद दर्द सहने की आदत-सी हो गई है।
ख़ामोश हूँ तो किनारे भी शांत खड़े हैं,
लहरों के भीतर मगर तूफ़ान बड़े हैं।
सागर भी चुप है, किनारा भी ख़ामोश,
फिर क्यों दिल में इतनी हलचल है रोज़?
कभी तेरी यादों की आहट सुनाई देती है,
कभी आँखों में नमी उतर आती है।
तू पास नहीं, फिर भी पास लगता है,
तेरा ख़याल ही मेरा साथ निभाता है।
तेरे बिना ये शाम अधूरी लगती है,
हर खुशी जाने क्यों मजबूरी लगती है।
महफ़िल में भी तन्हा-सी रहती हूँ मैं,
तेरी कमी हर पल महसूस करती हूँ मैं।
कहना बहुत कुछ है, मगर कह नहीं पाती,
दिल की बातें लबों तक ला नहीं पाती।
डरती हूँ कहीं आँसू राज़ न खोल दें,
इसलिए पलकों को भीगने नहीं देती।
कभी चाँद से तेरी खबर पूछ लेती हूँ,
कभी हवाओं से तेरा पता पूछ लेती हूँ।
रात जब चुपके से आकर मुझे घेरती है,
तेरी याद मेरी नींद चुरा लेती है।
तू लौट आए—बस इतनी-सी चाहत है,
आज भी दिल में वही पहली-सी मोहब्बत है।
वक़्त ने भले ही दूरियाँ बढ़ा दी हों,
दिल ने अब तक तुझे कहाँ भुलाया है?
अब किसी से कोई शिकायत नहीं करती,
अपने दर्द की नुमाइश नहीं करती।
मुस्कुराकर कह देती हूँ—“मैं ठीक हूँ,”
और रातों में चुपचाप रो लेती हूँ।
कुछ न कहने की आदत-सी हो गई है,
चुप रहने की आदत-सी हो गई है।
बाहर से शांत हूँ नदी के किनारे-सी,
मगर भीतर विरह की लहर उठती रहती है।
शायद यही प्रेम की सबसे बड़ी सज़ा है—
जिसे भूलना चाहो, वही सबसे ज़्यादा याद आता है।
और जिसे अपना कहकर दिल में बसाया हो,
वही दूर होकर भी…
हर धड़कन में सुनाई देता है।
कुछ न कहने की आदत-सी हो गई है,
हाँ…
तुम्हारे बिना रहने की आदत-सी हो गई है।
- सरिता पाठक
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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