नश्वर है यह देह हमारी, अमर नहीं अभिमान यहाँ,
क्षणभंगुर हर श्वास जगत की, टिकता कब सम्मान यहाँ।
मुट्ठी भर सपनों के पीछे, जीवन सारा बीत गया,
मोह-मरीचिका के वन में ही, सत्य कहीं फिर रीत गया।
कलियाँ हँसकर खिलती देखो, संध्या तक मुरझा जातीं,
जन्म-मरण के शाश्वत क्रम में, ऋतुएँ भी झुक-झुक गातीं।
महलों वाले, वनवासी भी, एक दिवस मिट जाते हैं,
कालचक्र के सम्मुख आकर, सब मस्तक झुक जाते हैं।
धन-दौलत का मान निरर्थक, पद की कैसी ऊँचाई?
संग न जाता रज-कण भर भी, रहती केवल सच्चाई।
मधुर वचन की अमिट सुगंधें, युगों-युगों तक महकेंगी,
करुणा, सेवा, सत्य-दीपिका, तम की सीमा लाँघेंगी।
दर्प धरा का धूल बनेगा, यश भी होगा क्षीण कभी,
केवल शुभ कर्मों की गाथा, गूँजेगी अविराम तभी।
नदियाँ सागर में मिल जातीं, पंछी लौट गगन के पार,
जीवन भी इक यात्रा भर है, मत समझो इसे अपार।
अंत समय जब दीप बुझेगा, साथ न कोई आएगा,
अपने कर्मों का ही लेखा, जीवन-पथ दिखलाएगा।
इस क्षणभंगुर जग के भीतर, प्रेम अमर उपहार बने,
मानवता की पावन सरिता, हर उर का श्रृंगार बने।
जीवन यदि है ओस-बिंदु-सा, क्यों फिर इतना अहंकार?
बाँटो स्नेह, क्षमा और ममता, यही मनुज का है श्रृंगार।
नश्वर तन है, नश्वर जग है, शाश्वत केवल कर्म महान,
जो जनहित में जीवन जीता, वही बनता है अमर विधान।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







