साहिल पे आ कर, समंदर से कैसा डर,
कस्ती डुबाए या करे उस पार ये लहर।
हमने भी खेला है जी भर, मुश्किलों से,
आते-जाते देखें हैं हमने ऐसे कईं भँवर।
तैरना सीखना है, तो उतरो न पानी में,
किनारे पे खड़े-खड़े जाएगा नहीं ये डर।
हौसले और जुनून से ही, है ये मुमकिन,
वरना पानी के ऊपर कहाँ तैरता पत्थर।
वही 'मुसाफ़िर' जीत सका इन लहरों से,
जिसने हराया है खुद को खुद के अंदर।
🖊️सुभाष कुमार यादव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







