कहाँ-कहाँ से समेटूँ ए-ज़िंदगी तुझको,
हर दिशा में तू बिखरी हुई सी लगती है,
इन्हीं बिखरे हुए लम्हों के बीच
खड़ा हूँ मैं
अपने ही जीवन के टुकड़ों को
धीरे-धीरे समेटता हुआ।
कभी यादों की धूल में
तेरा एक कोना मिल जाता है,
तो कभी अधूरे सपनों की दरारों में
तेरी आवाज़ सुनाई देती है।
तू पूरी कभी थी भी क्या?
या हमेशा से
ऐसे ही टुकड़ों में बंटी रही
कभी हँसी बनकर,
कभी आँसू की नमी में ढलकर।
मैंने चाहा तुझे
एक मुकम्मल रूप में जीना,
पर हर बार
मेरी हथेलियों से फिसलकर
तू कहीं और बिखर गई।
फिर समझ आया
तुझे समेटना ही जीवन नहीं,
तुझे महसूस करना ही सच है।
जो छूट गया,
वही तो कहानी बना,
जो टूट गया,
वही तो पहचान बना।
अब मैं नहीं खोजता
तुझे एक जगह पर,
न ही समेटने की जिद करता हूँ
बस जहाँ-जहाँ तू बिखरी है,
वहीं-वहीं खुद को जी लेता हूँ।
क्योंकि ए-ज़िंदगी,
तू सिमटकर नहीं,
बिखरकर ही खूबसूरत लगती है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







