मेरी कविता
घड़ी नहीं है
कि पीठ खोलकर
समय की कीलें गिनो।
वह
एक पुराना कमरा है—
दीवारों पर
रहने वालों के चित्र नहीं,
उनकी अनुपस्थिति टँगी है।
सीलन में
किसी बरसात की गंध,
और कोने में
एक खिड़की बंद—
जैसे किसी ने आख़िरी बार
बाहर देखकर
पर्दा गिरा दिया हो।
दरवाज़ा खोलो
तो भी भीतर मत जाना
किसी उत्तर की तलाश में।
कुछ देर
अँधेरे को
अपनी आँखों तक
आने देना।
किसी कोने में
तुम्हारा बचपन
धूल-सा पड़ा मिल सकता है।
उसे झाड़ना मत—
कुछ धूल
घर की आख़िरी स्मृति होती है।
शब्दों को
उँगली से मत कुरेदना।
वे दीवार में धँसी
कीलें नहीं
कि खींचते ही
पूरा घर खुल जाए।
कभी कोई शब्द
हथेली पर
ठंडी राख बनकर गिरे—
फूँककर मत देखना।
उसके भीतर
किसी अधजली रात की
लाल चिंगारी
बची हो सकती है।
और जहाँ
दीवार हथेली के नीचे
अचानक गर्म लगे—
वहीं रुक जाना।
वहाँ कोई बीता हुआ आदमी
अब भी
अपना माथा टिकाए
बैठा हो।
कुछ दरवाज़े
खुलते नहीं।
वे दूसरी तरफ़ से
किसी के आने की
आहट सँभालते हैं।
उनसे सवाल मत करना।
हर बंद दरवाज़ा
राज़ नहीं होता—
कुछ दरवाज़े
किसी लौटने वाले के लिए
बंद रहते हैं।
अगर लगे
कमरे में
तुम अकेले नहीं हो—
पीछे मत देखना।
कविता का सच्चा चेहरा
अक्सर
पीछे खड़ा होता है।
फिर तुम पूछोगे—
“इसका अर्थ क्या है?”
मैं शायद
मुस्करा दूँगा।
तुम्हारी उँगलियों में
कुछ ठंडा रह जाएगा—
चाबी नहीं,
चाबी का छूट जाना।
बस
उसे वहीं रहने देना।
दरवाज़ा खुला रहे।
तुम भीतर रहो।
और जो दिखाई न दे,
उसे भी
अपनी आँखों का हिस्सा
मान लो।
कविता
वह नहीं
जो पढ़ लेने के बाद
तुम्हारे पास बचती है।
कविता
वह है
जो पढ़ने के बाद
तुम्हारे भीतर
एक ऐसी जगह बना देती है
जहाँ तुम
पहले कभी नहीं गए थे।
लौटते समय
पता चलता है—
तुम कविता से बाहर नहीं आए,
कविता
तुम्हारे भीतर से
बाहर आई है।
उसे नाम मत देना।
कुछ चीज़ें
नाम मिलते ही
छोटी हो जाती हैं।
उसे
अपने भीतर रहने देना—
उतनी ही चुप्पी में
जितनी चुप्पी में
एक आदमी
रात के आख़िरी पहर
अपनी धड़कन सुनता है।
और पहली बार समझता है—
जिसे वह
कविता समझ रहा था,
वह उसका अपना
अभी-अनकहा जीवन था।
-इक़बाल सिंह ‘राशा’
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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