सुबह
दीवार में बची हुई धूप
आँगन में उतरी—
मैंने देखा,
पुरानी घड़ी की सुइयाँ
अब भी चल रही थीं,
हालाँकि
उसमें समय नहीं था।
किसी भूली हुई दोपहर ने
अपनी थोड़ी-सी धड़कन
उसके भीतर छोड़ दी थी—
जैसे समय भी
चलते-चलते
किसी अनकहे विराम में
ठहर गया हो।
बरामदे के कोने में
एक मिट्टी का दीपक पड़ा था—
तेल सूख चुका था,
बाती राख हो गई थी,
फिर भी
उस राख में
गर्मी की एक महीन लकीर
अब तक बची थी।
मैंने उसे छुआ—
उँगली पर
एक क्षण को
बीती हुई लौ
ठहर गई।
तब समझ आया—
कुछ बुझता नहीं,
बस अपना ताप
वक़्त के हवाले
कर देता है।
दोपहर तक
आँगन में पड़ा
एक पुराना घड़ा
रात की बची हुई नमी
अपनी ठंडी देह में
सँभाले रहा।
मैंने उसे छुआ—
हथेली पर
किसी अनदेखे जल का
स्पर्श ठहर गया।
और अचानक लगा—
हम भी
ऐसे ही घड़े हैं—
कुछ समय के लिए
किसी अथाह जल को
अपनी मिट्टी में
थामे हुए।
फिर एक दिन
देह अपनी चुप्पी ओढ़ लेगी,
और भीतर का जल
धरती की प्यास में
उतर जाएगा।
शाम हुई
तो मंदिर की घंटी बजी।
आवाज़ उठी,
आकाश में फैली,
फिर निस्तब्धता ने
उसे धीरे से
अपने भीतर
समेट लिया।
मैंने पूछा—
“तू कहाँ जाती है
जब सुनाई देना
बंद हो जाता है?”
घंटी चुप रही।
शायद उत्तर
आवाज़ में था ही नहीं।
रात आई
तो मैंने आकाश देखा।
एक तारा
टूटा नहीं था—
उसकी रोशनी बस
इतनी दूर चली गई थी
कि आँख
उसे अलग पहचान न सकी।
तब जाना—
विलीन होना भी
मिट जाना नहीं,
बस उस विशाल रोशनी में
अपनी अलग चमक
भूल जाना है।
इसलिए अब
जब कुछ मुझसे छूटता है,
मैं उसे रोकता नहीं।
पत्ता हो
तो हवा के हवाले,
आँसू हो
तो मिट्टी के,
साँस हो
तो उसी हवा के
जिसने उसे
मेरे भीतर भेजा था।
अपने लिए
बस एक छोटी-सी जगह रखता हूँ—
जहाँ “मैं”
धीरे-धीरे
हल्का होता जाए।
नाम छूटें,
स्मृतियाँ ठहर जाएँ,
देह अपना भार
धरती को सौंप दे।
और जब आख़िरी साँस
हवा में घुल जाए,
तो मैं भी
उसमें घुल जाऊँ—
न कोई नाम बचे,
न कोई आकार,
मौन में
बस वही बचे।
— इक़बाल सिंह ‘राशा’
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







