दृष्टा बैठा मौन है, रील चले दिन-रात।
अपनो ही इस खेल की, वाको खबर न बात॥
ईश्वर ईश्वर क्या रटे, वाको बोध न कोय।
हमरी दीनी दीठ से, वो परमेसर होय ॥
जानन की जो चेष्टा, कीन्ही जीव मँझार।
अहंकार की ओट ले, रोक्यो सब संसार ॥
शून्य डरावे जीव को, खुद शून्य न होय।
फँस्यो है अपनी फाँस में, अकल रही है रोय।।
तू ही जागे प्रश्न में, वो सोवे बेपीर।
कागज तू ही कलम तू, वो कोरी तहरीर ॥
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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