हम ख़ुद क़ो तोड़ के अपनों पे ख़ुद क़ो खर्च करते रहे
सबब ये हुआ हम उनकी नज़र में निहायती सस्ते रहे
एक-एक लफ़्ज़ तौला गया लहज़ो के तराज़ू में यूँ भी
हम भीगी आँखों सें उनकी की तोड़-मरोड़ देखते रहे
क्या फायदा अब रोने-धोने का गिले शिकवे करने का
तेरें पास थे तब धुत्कार खाते रहे ख़ुद क़ो कोसते रहे
क्यूँ पूछना है ख़ुश हैं या ज़िंदा है या मर गए कहीं पे
हाथ मिन्नतो में अकड़ गए हम तेरे दर पऱ तड़पते रहे
क़ीमत पूछने आए अश्क़ो की ज़ब आँखे ही सूख गई
क्या याद नहीं तेरे शानो पे सिर रखने क़ो सिसकते रहे
कृष्णा क़ो नहीं चाहिए कोई अपना जो दिखावे का हों
अपनों के बीच अपनों के हाथों ही मौत क़ो तरसते रहे...
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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