वो दर्द भी अब न रहा, जो कभी लाज़िमी था..
आंखों में आंसू थे, मैं भी तो आदमी था..।
वक्त तो रुका था, कुछ देर गुज़ारिश पे मेरी..
मुझे जहां होना था, बस वहीं मैं नहीं था..।
ये कौन बदल देता है, लम्हे-लम्हे किरदार मेरा..
कहीं हरी दूब, तो कहीं पथरीली ज़मीं था..।
हौले-हौले से उतर ही गया, रंग चेहरे का उसके..
जो दिखता था रंग-ए-नूर, वो सब मौसमी था..।
दूर तलक फैल गया है, ये सहरा आंखों में मेरी..।
अब तो याद भी नहीं, यहां गुल कोई शबनमी था..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







