घुटन बढ़ने लगी है घर की आब-ओ-हवा में अब तों
लगता है जान ही जाएगी घुटन की फ़िज़ा में अब तों
कदमों में सिर देकर इश्क़ की दुहाई देते-देते हार गए
हम मफ़गूर निकले, खा गई किसकी बद्दुआ अब तों
एक औरत होने के नाते हर रिश्ते ने धुत्कार दिया हैं
सोच रही हूँ क्या मुझे मर जाना चाहिए ख़ुदा अब तों
बड़ा ग़ुरूर करा करते थे एकलौती बहन-बेटी होने पे
ये ग़ुरूर नासूर बन गया न रही जिसकी दवा अब तों
जिंदगी का ज़ुर्म सहते-सहते अब बस हुआ और नहीं
इसकी भी अदालत लगे और लगे भारी दफ़ा अब तों
कृष्णा के हवाले से कुछ लोग क़ाबिल नहीं औरत के
हर औरत की बद्दुआ लगे ,मिले इनको ज़फा अब तों ...
-कृष्णा शर्मा
मफ़गूर = जिसका सिर फट गया हो या जिसका ज़ख़्म गहरा हो
ज़फा = अत्याचार/बेवफ़ाई


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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