ऐसी फ़रामोशी-ए-इश्क़ कैसी,
दिल में उतर गई वो बात कैसी!
हुज़ूर इतना इतराना आसाँ नहीं,
पर हाल-ए-दिल छुपाना कितना ज़रूर है!
मोहब्बत एक तेरी तरह होती है,
पर मोहब्बत की बातें मैं किस तरह करता जाता हूँ!सहूलियत ही नहीं है कुछ बताने को,
न जाने मैं क्या-क्या छुपाता जाता हूँ!
जुनून में मगर हम कितने बीमार हुए,
वो फ़साना है, फिर दोस्त हाज़िर नहीं,
कैसे बताऊँ ज़माना मदहोशी है!
फ़ना हुए तो एक दिल को हमने कुछ देर को टहला दिया,
मगर जान फँसी है उसी मोहब्बत के तराने में,
एक जान को निकाल कर फिर एक जान को फँसा दिया!
तराशा ऐसा मैंने अपनी मोहब्बत में कि,
मालिक का घर उजाड़ दिया,
वो इतनी दूरी का जो मैंने अपने अंदर नशा किया था,
वो आँखों से गिरा कर फिर होठों से लगा दिया!
वादा तो मैं कर रहा था अपने दिल के उन कोनों को,
पर एक आवाज़ में मेरे ख़ून ने सब तबाह कर दिया!
मैं जाऊँ तो सारी की सारी हिमाक़तें मुझसे लिपट जाएँ,
एक बहाने ने मेरा कर्ज़ा उतार कर,
फिर मुझे उधार कर दिया!
मैं मोहब्बत के घर से गिरा हुआ शख़्स हूँ,
मेरी मोहब्बत में ये किराया किसने अदा किया!
जहन्नुम में मैं देखता हूँ कि,
मेरी तरह के शख़्स उनकी मोहब्बत को छू रहे हैं,
और मुझे जो फ़सानों में एक आदमी दिखता,
उसने मुझे जला कर राख कर दिया!
तुम अल्तले में हमें सिर्फ़ सिफ़ारिश किए बैठे हो,
किस जहान से तुम आए थे,
इस जहान में क्या कर बैठे हो!
बकायदा हमें तो अपना उसूल मालूम है,
मगर मोहब्बत में तो ज़िक्र ही सिफ़ारिश है!
उनके ही दरमियाँ वो हमें मोहब्बत के पेच सिखाते हैं,
क्या इस तरह उनकी आँखों में हम नज़र आते हैं!
सोचिए उस मोहब्बत को कितनी बार हमने,
किस तरह से जिया होगा,
वो मोहब्बत भी तो आला किसी की होगी!
मगर उठाकर हम फिर उन्हें ज़मीन से देखते हैं,
वो ऊँचाइयों पर जाकर किस जहन्नुम में अपनी दरवेश दिखा रही है!
एक ज़माना भी इस मोहब्बत के लिए गुज़ार दिया जाता है,
क्यों वो बार-बार ठोकरें खाकर उसी मोहब्बत को गले लगाता है!
अना-वत-ए-हुस्न अर्ज़ी किस तरह हो जाती है,
ये मोहब्बत तो नज़र आती है, फिर किसकी हो जाती है!
बताओ हम इस तरीक़े से कितने तबाह हुए,
अना रहे फिर भी फ़ना हुए!
ऐसी अदाएँ उनके पास हैं तो हम क्या करें,
हमारी इस जिस्म की ख़ुराक में सिर्फ़ दर्द है,
क्या इसे भी अदक जमा करें!
उठती नहीं हैं बाहें फिर भी फैलाए जा रहे हैं,
मोहब्बत क्या होती है ये बताए जा रहे हैं!
यह होना ही तो मेरी तरह था,
बाक़ी इश्क़ करना किसे आता है!
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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