तुम एक बार खुद से मिलो,
मिलकर देखो,
कि तुम खुद से कुछ नहीं मांग सकते,
ना ही तुम ख़ुद को कुछ दे सकते हो,
पर जरुरी नहीं कि तुम वैसे मिलोगे जैसे ये खुद है,
तुम आकाश कि तरह खुले हो,
इसलिए तुम्हारी भरी भरी उम्मीदें इसे पसंद नहीं,
ये तुम्हारे पाने खोने का बोझ नहीं ले सकता,
ये सिर्फ मिलेगा तुमसे,
स्वीकार करेगा,
तुम्हे भी उसी तरह आज़ाद करेगा,
जैसा ये है,
जैसे तुम खुद हो,
तो तुम तुमसे मिलो,
मिलो तो सही,
एक बार खुद से ही पूछ लो,
कि तुम कैसे हो।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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