गत दिनों दिवाली के आसपास
जब शाम ढलने को थी आतुर..
चांदनी सज रही थी कहीं रात के
दूसरे पहर में
मैं जा बैठा गंगा की गोद में..
जैसे पंखों में समेटे हुए आसमां को,
कोई पंछी घर लौट रहा था..
एक निश्चल धार के किनारे बैठा
एक आह्लादित स्पर्श में डूबा हुआ..
उस धार में पानी के साथ मेरा
मन भी बहा जाता था..
गंगा, को रात चुनरी सी ओढ़ाने चली आ
रही थी,
और मैं अपना समूचा अस्तित्व लिए
गंगा की उस देही में खुद का स्पंदित
महसूस करता रहा..
जीवन में आज कुछ अलग ही चैतन्य
लिए मैं बैठा रहा..
और फिर मैं जब अगले दिन
वापिस लौट रहा था..
तो देखा कि गंगा मैं लौट आया था,
वो कलरव से भरी जलराशि का जोश,
और बहुत से आवेग अब उसमें बहे जा रहे थे..
ओर मैं मां को उन्मादित्त हो प्रणाम कर
लौट रहा था, अपने घर..
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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