दिल-ए-दाग़-दार थम न जाए सो ख़ुद क़ो टोका हमनें
मानो शब-ए-ग़म में अश्क़ो क़ो तकिये सें सोखा हमनें
तिल-तिल दिल जला तब जाकर सुबह हुई ज़िस्म की
अहद-ए-मुसीबत में खुदखुशी सें ख़ुद क़ो रोका हमनें
हाये,ये तमाम रिश्ते ये नाते और ये ज़ाहिरदारी इनकी
ज़ाहिर-परस्ती सें खाया कई दफ़ा मकर्रर धोखा हमनें
सब ठीक हों जाएगा ये ज़ुमला सुनते-सुनते थक गए
नीम-हक़ीम के दर पे बमुश्किल ख़ुद क़ो झोका हमनें
क्या मुख़ालिफ़त करते अपने नसीब के हाथों मारे गए
ख़ुदा के दर पे अपनी लग़ज़िश क़ो फिर कचोटा हमनें
ये गुल-फ़िशानी वाले क्या जाने मेरी बेबसी क़ो जानाँ
अश्क़ो वाले चेहरे पर तबस्सुम का नक़ाब ओढ़ा हमनें
क्या ज़िल्लत हैं,क्या मुफ़लिसी,क्या ही नसीब कृष्णा
ऐसे ऊपरवाले की लिखवाट क़ो कई दफ़ा कोसा हमनें
-कृष्णा शर्मा
दिल-ए-दाग़-दार = घायल दिल, शब-ए-ग़म = दर्द वाली रात
अहद-ए-मुसीबत = मुसीबत का दौर, मुख़ालिफ़त = विरोध
ज़ाहिरदारी = अपनों का दिखावा, लग़ज़िश = भूल
ज़ाहिर-परस्ती = दिखावे पऱ टिका रहना, तबस्सुम = हँसी
मुफ़लिसी = तंगहाल, मकर्रर = बार-बार,
गुल-फ़िशानी = खुशी की मुस्कुराहट


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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