चेहरों की भीड़ में
एक चेहरा मुस्कुराता है,
दूसरा
चुपचाप अपने ही भीतर
आँसुओं का समुद्र समेटे रहता है।
कितना विचित्र है—
होठों पर अपनापन,
आँखों में स्नेह का अभिनय,
और हृदय के किसी अँधेरे कोने में
ईर्ष्या की धीमी-धीमी आग।
दोहरे चेहरे
सिर्फ़ लोगों के नहीं होते,
वह समय के भी होते हैं,
रिश्तों के भी,
और कभी-कभी
हमारे अपने विश्वास के भी।
जो सामने मिलते हैं
वह हाथ थाम लेते हैं,
पीठ पीछे
उसी हाथ की ऊष्मा को
ठंडी हवाओं में बदल देते हैं।
सब कुछ जानते हुए भी
मन फिर विश्वास कर लेता है,
क्योंकि संवेदनाएँ
संदेह से नहीं,
प्रेम से जन्म लेती हैं।
मैंने सीखा है—
हर मुस्कान को
सच्चाई का प्रमाण मत मानो,
हर शब्द को
हृदय की आवाज़ मत समझो।
फिर भी
मनुष्य होना छोड़ना नहीं है।
छल के बीच भी
करुणा बचाए रखना,
कपट के बीच भी
अपनी आत्मा को निर्मल रखना—
यही सबसे कठिन साधना है।
दोहरे चेहरे
कुछ समय के लिए
दर्पणों को धोखा दे सकते हैं,
किन्तु
समय की निष्पक्ष आँखें
हर मुखौटे के आर-पार देखती हैं।
अंततः
जीत उसी की होती है
जिसके चेहरे और चरित्र के बीच
कोई दूरी नहीं होती;
जो भीतर भी उतना ही उजला है
जितना बाहर दिखाई देता है।
क्योंकि
मुखौटे बदलते रहते हैं,
पर सत्य का चेहरा
कभी बूढ़ा नहीं होता।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







