तुम मेरी बात मानो,
मानोगे क्या,
पर क्या,
बातें, भाव, मिलन, हित-अहित, जिज्ञासा,
चाह,राह,सह,उतना ही है जितना इस बात में भरा है,
हम लोग सिर्फ खाली करते हैं,
इन बातों को,
जो हमें संतुष्टि दे,
सुकून दे,संतुलन रखें,
वो ही हम,
कोई भी हो,
अपनी वो चाबी निकालता है,
फिर उन बातों में,
अपने अपने ताले खोलते हैं,
फिर बात माने,
ना माने,
हम वो ही बातें करते हैं,
इसमें कोई जुड़ाव नहीं होता,
अतः अंततः कोई किसी से बात नहीं करता है,
बस दो लोग मिलकर भी,
अपनी अपनी बातें करते हैं,
मिलन वाली कहीं बातें नहीं हुई,
क्या करें,
और ये हमराही इश्क़ तक पहुंच जाते हैं।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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