अंदर के समन्दर को बहने के वास्ते
चाहिए सजल नेत्र और व्यथित मन..।
वो उमड़ता घुमड़ता है और नसों से
निचोड़ता है, थोड़ा थोड़ा खारापन
हर रोज..।
मगर फिर भी बच जाता है, यहां वहां
धमनियों की ओट में..
और भावनाओं को उद्वेलित करने
का जिम्मा निभाता है..
ये इंसान के भीतर का सागर
हिलोरे लेता है और
बार बार लहरों को दर्द की कश्ति में
बैठाकर भेजता है आँखो के पोरों तक..
और इंसान विपरीत हालातों को आते देखकर
ही, उगलने लगता है, वो खारापन जो उसने
सारी उम्र एकत्रित किया है
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







