बेटियाँ अपनी होती हैं
क्यों बेटियों को पराया माना जाता है?
क्यों समाज बेटियों को बेटों से कम समझता है?
माना कि ज़माना बदल गया है,
बेटियाँ बड़ी ऊंचाइयों को छू रही हैं;
पर फिर भी समाज की सोच नहीं बदली,
बाहर से चाहे सही दिखता हो,
पर मैंने समाज को अंदर से देखा है।
बेटी के जन्म होने पर
मुंह से चाहे ये निकले
कि लक्ष्मी घर आई है,
पर मन में वही सोच
कि पराई घर आई है।
एक दिन ससुराल चली जाएगी,
और अगर नहीं
तो सर पर बोझ बन जाएगी।
पर क्या समाज ने कभी ये देखा है
कि बेटे पास रहके भी
माँ-बाप का उतना ख्याल नहीं रख पाते,
जितना ख्याल बेटियाँ ससुराल में रहके भी रखती हैं।
यूँ तो समाज काफी हद तक बदल चुका है,
बेटियों को अपना हक मिलने लगा है,
पर फिर भी कहीं न कहीं ये बात बीच में आ ही जाती है;
तो आइये,
समाज की इस सोच को बदला जाए,
बेटियों को पराया नहीं अपना बनाया जाए


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







