इस ज़माने ने जाने कितने तीर मेरे सीने में चुभो दिए
आह ऐसी उठी तमाम उम्र क़ो ही अश्क़ो में डुबो दिए
घर की इज़्ज़त दार बेटी सिसकियाँ लेती रही रातभर
बाप-भाई ताने देकर अपने कमरों में सुकूँ सें सो दिए
नाशुकरी, नाक़ाबिल, नालायक़ होने का तमगा मिला
उन्हें ख़बर कहाँ कितने रंज-ओ-ग़म शानो पे ढ़ो दिए
अपने थे सो लिहाज़ किया अपने लबों को सिल बैठे
सीना ज़ख़्मी हुआ ख़ामोशी ओढ़े हम कमरे में रो दिए
क्या कहते क्या शिकवा क्या शिकायत करते हम बता
औरत होने के नाते गलत थे सो सारे हक़ ही खो दिए
बे-नज़ीर न बन सके शायद यहीं मसला खा गया हमें
ये वक़्त भी ज़ालिम बना कई अश्क़ आँखों में बो दिए
मैं सबर ही करती रही उसकी फ़क़त एक निगाह क़ो
उसने न जाने कितने इलज़ाम मेरे वजूद में पिरो दिए
कृष्णा फ़क़त दर्द लिखती हों क्या मुहब्बत नहीं तुमकों
किसी को क्या कहें दर्द ने ये अहसास कब के धो दिए...
-कृष्णा शर्मा
बे-नज़ीर = अद्वितीय सफलता पाने वाला


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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