"अनकही चीख़: ट्विशा"
नोएडा की गलियों से निकली थी वो,
हाथों में मेहँदी, आँखों में सपने।
भोपाल के उस घर को अपना कहा था,
पर न जाने किस मोड़ पर बिखरे अपने।
पाँच महीने में ही मौसम बदल गए,
रिश्तों की धूप छाँव में ढल गई।
कानून की किताबें जिस घर में थीं,
उसी देहरी पर इंसाफ की साँस जल गई।
फ़ोन की स्क्रीन पर काँपते अक्षर थे,
"माँ, मुझे यहाँ से निकाल लो।
ये दीवारें निगल जाएँगी मुझको,
आकर मेरी साँसें सँभाल लो।"
देह पर निशान थे कुछ पुराने,
कुछ नए ज़ख्म मन पर गहरे।
एक जीवन तो कोख में ही सो गया,
दूसरा झूल गया सन्नाटे के पहरे।
वो न्याय की बेटी, न्याय की बहू थी,
पर न्याय ही उससे रूठ गया।
जिन हाथों में तराजू थी इंसाफ की,
उन्हीं हाथों से उसका सूत टूट गया।
ट्विशा अब तारीख़ नहीं, तक़ाज़ा है,
हर उस माँ का जो विदा कर डरती है।
हर उस बहन का सवाल है जो पूछे,
क्या बेटियों की उम्र बस इतनी ही होती है?
ऐ खामोश शहर, अब तो बोल,
इस चुप्पी का हिसाब कौन देगा?
जब रक्षक ही भक्षक बन जाएँ,
तो दीया तले अँधेरा कौन लेगा?
हम कविता लिखेंगे, नारे लगाएँगे,
जब तक सच की लौ न जल जाए।
तेरी अधूरी साँसों की क़सम ट्विशा,
तेरे हक़ का सूरज उग कर ही जाए।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार )


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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