जो ना था सामने उसे याद करता है,
इंसान न जाने किस बात से डरता है।
जो ना दिखता है अब, उसमें सब कुछ देखते हैं,
इंसान भी कितनी अजीब हरकतें करते हैं।
जो बेकरारी वो बिछुड़ जाने पर करता है,
इंसान फिर चैन से क्यूँ कहीं नहीं रह पाता है।
जो वो चाहता है वो ज़माने को क्यूँ नहीं बता पाता है,
इंसान क्यूँ इतना खुद में ही छुप जाता है।
जो जीवन खुद बार बार ओझल है और अचानक अस्पष्ट रह जाता है,
वो क्यूँ इंसान को हर वक्त बदलना चाहता है।
जो अस्थिरता को वो इस जंहा में देखता है,
इंसान फिर यहाँ से किस स्थिरता को देखना चाहता है।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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