अमृत की बस एक बूंद गिरी थी कभी,
इसीलिए इस माटी की कोख में जीवन है,
इसीलिए यहाँ 'एक' होना ही
सबसे बड़ा और पवित्र सत्य है।
सृष्टि के इस आँचल में
मूलतः कोई ज़हर नहीं है,
वह जो कुछ भी है...
बस मनुष्य के कंठ तक ठहरा हुआ है।
मनुष्य ज़हरीला है—
अपने मस्तिष्क की साजिशों से,
अपनी नज़रों के पूर्वाग्रहों से,
अपने मन की उलझनों,
गले और मुँह की कड़वाहट से।
मगर इस कोलाहल के पार...
कंठ के ठीक नीचे,
जहाँ से उसका हृदय शुरू होता है,
मनुष्य आज भी पूरी तरह
उसी आदि-अमृत में डूबा हुआ है।
— ललित दाधीच
• सृष्टि का मूल आधार:
धरती पर जीवन का उद्गम कोई आकस्मिक संयोग नहीं, बल्कि अमृत की उस एक बूंद का प्रभाव है जो कभी ब्रह्मांड से यहाँ गिरी थी। यही कारण है कि इस धरा पर 'एक' (एकता, अद्वितीयता और अखंडता) का महत्व सर्वोपरि है; क्योंकि जीवन का आदि-स्रोत वही एक बिंदु है।
• प्रकृति की पवित्रता:
इस संपूर्ण चराचर जगत में मूल रूप से कोई विष नहीं है। प्रकृति अपने शुद्धतम रूप में अमृतमय है। विष तो केवल एक मानवीय निर्मिति है, जो सृष्टि में कहीं और नहीं, बल्कि सिर्फ मनुष्य के अस्तित्व की ऊपरी परतों में निवास करती है।
• मनुष्य का ज़हरीला तंत्र:
मनुष्य का विषैला होना उसके पूरे अस्तित्व का सच नहीं है। वह केवल अपने मस्तिष्क की जटिलताओं, नज़रों के पूर्वाग्रहों, मन के द्वेष, गले की संकीर्णता और मुँह की वाणी तक ही ज़हरीला है। मनुष्य के भीतर का कोलाहल और विष केवल उसके कंठ (गले) तक ही सीमित है।
• हृदय का शाश्वत सत्य:
कंठ के ठीक नीचे, जहाँ से मनुष्य का हृदय स्पंदित होता है, वहाँ विष की एक भी बूंद प्रवेश नहीं कर पाती। अपने अंतस और हृदय की गहराइयों में मनुष्य आज भी पूरी तरह आदि-अमृत से सुरक्षित और पवित्र है। बुराई केवल सतही व्यवहार में है, मनुष्य का मूल स्वभाव करुणा और अमृत ही है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







