टहनियों के बाहों में, जब झूलतीं हैं
फूलों का बचपन,तब, शीतल हवाएं
ये सब देख देख, खुद पर इठलातीं हैं,
जागतीं हैं, उठती हैं, दूधिया रात्रि की
चादर के नीचे से,जब ओंस की बूंदें
इन कलियों को , खूब नहलातीं हैं
रश्मि -गुच्छ दिनेश की, ऊर्जित कर देतीं हैं
इनकी नव पंखुड़ियां ,भर जाती हैं इनमें
उनींदी अंगड़ाइयां,
फिर नवशिशु सी , चंचलता कोमलता
भर जाती हैं, अंदर तक
भींचे हुए होंठ , मुस्कराने लगते हैं
महकती है इनकी हर घड़ियां
निशा की नीरव कुंज में
कीट- पतंगों की सुनकर लोरियां
मीठी नींदों में सो जातीं हैं
ये मनमोहक कलियां
भौरें, तितलियों संग
खेलने इठलाने की
मीठे सपनों में खो जाती हैं
ये मासूम कोमल कलियां।
भोर की अगली बेला में
सूरज की कुंदन किरणें
अपनी रूमरूमाती किरणों से
छू छूकर इन्हें जगाया करतीं हैं,
अली के गीत, तितली के प्रीत,
सर -सर हवाओं की संगीत
टहनियों की हलचल,बन मनमीत
जगाने के लिए डुलाया करतीं हैं।
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







