एक दिन मेरे अक्स ने कहा—
अपनी रूह की गहराई में उतर,
ज़रा ख़ुद को पहचान।
मेरे अहम् ने मुस्कुराकर कहा—
मुझे सब पता है,
यह मेरी ज़िन्दगी है
और मुझसे बढ़कर कोई नहीं ।
अक्स ने फिर कहा—
जो दिखता है, वह सच नहीं,
इस चमक में कोई उजाला नहीं।
ज़रा अपने भीतर झाँक,
ज़रा ख़ुद को जान।
मेरे अहम् ने फिर कहा—
बस मैं ही मैं हूँ,
मुझसे ख़ास कुछ भी नहीं।
यह सब मेरा है,
इससे बड़ी कोई सच्चाई नहीं।
बेचैन हुआ अक्स फिर बोला—
क्यों इस भ्रम में जीता है?
रूप, रंग, शोहरत, यह अहम्—
सब यहीं रह जाना है।
बाहरी माया में उलझा तू,
अपने मन में क्यों उतरता नहीं ?
यह सुन मेरा मन ठहर गया,
और फिर बोला—
अज्ञान और माया के इस अंधे कुएँ में
गिरा हुआ हूँ मैं,
अब निकलूँ कैसे?
इच्छाओं और तृष्णा की आग में
जलता हुआ हूँ मैं,
अब ख़ुद को बचाऊँ कैसे ?
अक्स ने धीरे से कहा—
जिस क्षण “मैं” नहीं रहेगा,
उसी क्षण “वह” नज़र आएगा।
अहम् का पर्दा हटते ही
तू अपने वास्तविक अक्स से मिल जाएगा।
वन्दना सूद
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







