सफर है रात दिन और कुछ हासिल नहीं है
ये दुनियां आख़री शायद कोई मंजिल नहीं है
लगती है खूबसूरत कितनी फूलों सी नाजुक
लेकिन ख़ुशी हरदम यहां कामिल नहीं है
तीर उसका हर जिगर के पार होता है मगर
लगता है उसको तो कोई घायल नहीं है
हर किसी का ना कुछ होता है मेयार
आज का इंसान इसका कायल नहीं है
कुछ ना कुछ तो आज होके ही रहेगा
दास फितरत का कोई पर हल नहीं है!


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







