तुमने गाँव अपना बेच दिया,
तरक्की के नाम पर खेत बेच दिया,
सपनों की खातिर जीवन बेच दिया,
बाज़ार में बदलता जीवन।
बहती थी निर्मल हवा पल-पल,
गूँजती थीं खगों की बोलियाँ अविरल,
खो गई उनकी हर लय, हर पल,
धुआँ है, वाहनों का कर्कश कोलाहल।
चकाचौंध की इस अंधी दौड़ में,
मानवता दबी कलपुर्ज़ों के शोर में,
जीने-मरने का फ़र्क भी भूल गए,
अर्थ की चाह में सारे अर्थ खो गए।
क्या थी ज़मीन तुम्हारी जो बेची?
क्या थी हवा तुम्हारी जो बेची?
झरने और नदियाँ भी कहाँ बचीं?
बेच दिया सब, शत-प्रतिशत।
ज़रूरत से ज़्यादा की चाह में,
घोल दिया ज़हर हवा में,
घोल दिया ज़हर पानी में,
ज़हरीला होता घर-समाज।
सस्ते सपनों के बदले कल को दिया,
अंधकार को अपना भविष्य दिया,
रोज़गार के नाम पर बच्चों को बेच दिया,
व्यापारी कलियुग सब कुछ लील गया।
मशीनों व ठेकेदारों के हाथों,
बर्बाद हुए हम अपने ही हाथों,
दूषित किया हवा-पानी अपने हाथों,
जीवन का लक्ष्य केवल मुनाफ़ा?


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







