
हरिवंश राय बच्चन (1907-2003)हिंदी साहित्य के 'उत्तर छायावाद' काल के सबसे प्रभावशाली कवियों में से एक थे। उन्हें मुख्य रूप से 'हालावाद' का प्रवर्तक माना जाता है।
इनका जन्म 27 नवंबर 1907, प्रयाग (इलाहाबाद), उत्तर प्रदेश। इनका पूरा नाम हरिवंश राय श्रीवास्तव है (बचपन का नाम 'बच्चन' बाद में उपनाम बना)।
इनकी शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय (MA) और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (PhD) से हुई।
वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे,
भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में कार्य किया, और वह राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे।
उन्होंने कविता के साथ-साथ आत्मकथा और अनुवाद के क्षेत्र में भी अमूल्य योगदान दिया।
हिंदी साहित्य में विशेष योगदान के लिए 1976 पद्म भूषण,
'दो चट्टानें' के लिए 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार,
अपनी आत्मकथा के लिए सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया गया है
काव्य संग्रह:-
'मधुशाला' (सबसे प्रसिद्ध), 'मधुबाला', 'मधुकलश', 'निशा निमंत्रण', और 'सतरंगिनी'।
आत्मकथा (चार खंड):-
'क्या भूलूं क्या याद करूं','नीड़ का निर्माण फिर', 'बसेरे से दूर' और 'दशद्वार से सोपान तक'।
अनुवाद:- शेक्सपियर के नाटकों (मैकबेथ, ओथेलो) का हिंदी अनुवाद।
उनका सबसे प्रसिद्ध काव्य संग्रह"मधुशाला" जिसे पहली बार उन्होंने 1933 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के मंच से पढ़ा था, तब से लेकर अब तक "मधुशाला"का नशा सभी पर छाया हुआ है "मधुशाला" में 139 रूबाइयां है जिनमें से कुछ रूबाइयां आज आपके लिए प्रस्तुत है ....
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
✍️मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला।
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।
✍️प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला।
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।
✍️प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला।
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।
✍️भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला।
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।
✍️मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला।
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।
✍️मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला।
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।।
✍️मेरी हाला में सबने पाई अपनी-अपनी हाला,
मेरे प्याले में सबने पाया अपना-अपना प्याला,
मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा,
जिसकी जैसी रुचि थी उसने वैसी देखी मधुशाला।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
Article by
Admin - Reena Kumari Prajapat 


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







