भोजपुरी भाषा अपनी समृद्ध लोकसंस्कृति और साहित्यिक परंपरा के लिए जानी जाती है, लेकिन हाल के वर्षों में इसके कुछ मनोरंजन माध्यमों में बढ़ती अश्लीलता ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह चिंता केवल कला तक सीमित नहीं, बल्कि समाज और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी हुई है।
मनोरंजन के नाम पर त्वरित लोकप्रियता और व्यावसायिक लाभ की दौड़ में कई बार भाषा की मर्यादा को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। डिजिटल मंचों की आसान पहुँच और प्रभावी नियंत्रण की कमी ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया है। इसका असर खास तौर पर युवाओं पर पड़ता है, जिनके लिए भाषा और कला संस्कार गढ़ने का माध्यम होती है।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि समस्या पूरी भोजपुरी संस्कृति की नहीं, बल्कि कुछ प्रवृत्तियों की है। आज भी अनेक कलाकार और रचनाकार सार्थक, स्वच्छ और सामाजिक मूल्यों से जुड़े कार्य कर रहे हैं, जिन्हें प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
भोजपुरी मनोरंजन की दिशा सुधारने के लिए कलाकारों की सामाजिक ज़िम्मेदारी, दर्शकों की जागरूकता और संस्थागत निगरानी—तीनों आवश्यक हैं। भाषा की लोकप्रियता तभी स्थायी बन सकती है, जब वह सम्मान और संस्कार के साथ आगे बढ़े।
-सिद्धार्थ गोरखपुरी


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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