Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

विमर्श - स्त्री पुरुष का

विमर्श - स्त्री-पुरुष का

हाल इन दोनों का ऐसे ही नहीं हुआ,
दोनों में बदलाव बड़ी बात है,
यह विषय ऐसा
जो कहीं नहीं सही हुआ।

हर बात का प्रमाण भी मिले,
पर दोनों स्थितियों में
कोई परिवर्तन नहीं हुआ,
आइए विमर्श करें -
स्त्री-पुरुष का।

1.
कई किस्से हैं,
कहने से क्या होंगे,
मैं कह दूं, कोई चंद लोग कह दें,
पर यह बड़ा वर्ग है,
छोटी-छोटी जटिलताएं हैं।

सब जगह पैमाना है,
स्थिति जरूरी नहीं कोई खड़ा हो जाए,
मुश्किल है।

आसान यह है कि
दोनों के जीवन के उस पटल पर
घटनाएं भीतर, बाहर और मध्य में
कुछ ऐसा करती हैं
कि वो कह भी दे पर जानता है
वो नहीं बचेगा,
अतः हल्का-हल्का आगे बढ़ेगा।

स्त्री को जन्म लेने का खतरा,
कहीं किसी की मति में गलत धारणा न हो,
पुरुष को जन्म का नहीं,
लेकिन जन्म बाद उससे सबने
मूकबधिरता अपना ली।

स्त्री के लिए शब्द निरस्त हैं,
कहने पर उसे प्रताड़ित करने की संभावना है,
और पुरुष के लिए भावनाएं निरस्त हैं,
कहीं उसे भी भाव-भंगिमा से हर्ष न आए।

तो दिक्कत दोनों को है,
हमने इसे समस्या बनाया,
पर दोनों को भूल गए,
अभी वही है,
उनका सफर खत्म नहीं है,
बदलाव होना बस बदल गया।

2.
जन्म और भाषा का
तो कोई समाधान नहीं मिला,
क्योंकि ये समस्या नहीं,
ये मूल रूप है,
और मूल रूप को समझने की
सबमें क्षमता विकसित हो।

कर्तव्य, कर्म, जिम्मेदारी,
एक भूमिका अपने हिस्से ठीक है,
पर मूल रूप में उनको जगह दो,
और उनको समझने तो दो।

नहीं हुआ,
उसके लिए आज सब कुछ बदलना चाहते हैं,
पर वो नहीं हो रहा
जहाँ कुछ न बदलना था।

3.
पुरुष अनजानी सड़कों पर खड़ा किया,
उससे कहें -
सब कुछ व्यवस्था तुम करो,
घर में नहीं, घर के बाहर,
बाहर वाले उदासीन रहें,
अब पुरुष बाहर से भी गया,
अब कहाँ रहे?

उससे हम उम्मीदों की डोरी बांधे रहे
जब तक वो छलनी न हो,
और घाव पर ग़म दिए, दवा न दी,
बाहर दबदबा रहे,
हर पुरुष भीतर लहूलुहान रहे।

ये नहीं कि उससे कम करें
आनन-फानन में बोझ।

4.
स्त्री घर में ही ठीक है
और उसी बंद कोठरी में
वो ही उलझन में रहे,
एक घुमावदार कर्म में
वो पीस गई।

हाँ, संस्कृति भी अपनी जगह है,
पर क्या उसके अलावा
शेष तीन-चौथाई हिस्सा
स्त्री के जीवन का कहाँ है?

एक जगह से दूसरे घर,
वह उसकी जगह कहाँ है?
रोज-रोज तीन समय
वो कितना खाना बनाए,
और इतनी क्यों उलझी रहे
बच्चों में, कपड़ों में,
खाने में, साफ-सफाई में,
ये ज़्यादा नहीं?

फिर वह घर किसका
जहाँ स्त्री नहीं और पुरुष नहीं,
जब वो बाहर निकले
वही पुरुष उसको घूरे और बदला ले,
यहाँ दोनों का अस्तित्व दर्दनाक निकला,
यहाँ मौत भी न मरे।

गलती हुई कहाँ,
वो पुरुष स्त्री के जिस्म तक छूट गया
इसलिए बदनाम हुआ,
रूह में जाता तो जगह थी,
पर खत्म तो दोनों हुए।

यहाँ कोई नहीं देखा,
क्योंकि यही अभद्रता दिखी,
पर यही दोनों मृत रहे,
मिले नहीं।

5.
स्त्री के कामों का कोई मानदेय नहीं
और मानदेय है तो
अजीब शर्तों पर देना है,
पुरुष को काम ही काम
और उस सम्मान से
उसे कोई काम-देय नहीं,
और दे तो पसीना टपके
उतनी जगह या समय नहीं।

थके हैं दोनों,
जीवन जीना चाहते हैं।

संसार के हर बिंदु में
तुमने उनका मूलरूप देखा,
पर दोनों कहाँ देखा,
देखा तो बस उनको उलझन में।

6.
हृदय, प्रेम, मन, चित्त,
चाह, जिक्र, पहचान,
विनम्र, विनय, विवेक,
विश्वास, वक्त, विमल, शांत,
शब्द, विचार, भाव,
अश्रु, सुकून, आशा,
है तो,
उन तक प्रवेश नहीं।

स्त्री बस एक जगह तो रहे,
पुरुष उस जगह पर पैर तो रखे,
फिर कहते हो -
मृत्यु तक हमसे सब छूट गया,
पर मृत्यु तो बस उस जगह
तुम्हारे न होने पर रहने आ गई।

जाति, लिंग, जज़्बात के खेल में
हम चिन्हित उन दोनों को ही करते हैं।

- ललित दाधीच




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रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (2)

+

मनोज कुमार सोनवानी "समदिल" said

वाह क्या बात है👌👌 ललित जी, स्त्री पुरुष के बीच सामंजस्य का रिश्ता हो और सामंजस्य में शर्ते न हो तो जिंदगी आसान हो जाती है। सादर प्रणाम करता हूँ!!

ललित दाधीच replied

धन्यवाद ❤️ ❤️ आपकी समीक्षा के लिए बहुत ही हृदय भाव आभार, आपका प्रणाम स्वीकार है और आपको भी दिलों दिल से प्रणाम।

Lekhram Yadav said

बहुत सुन्दर रचना, आपको सादर नमस्कार

ललित दाधीच replied

धन्यवाद ❤️ ❤️ आपको सहृदयता से आभार, आपको भी मेरा सादर प्रणाम

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