थक हार के जब आता हूँ घर
फिर अपने आप से मिलता हूँ
फ़टे पुराने सपनों को अपने
अब उम्मीदों से सिलता हूँ
उम्मीद पे कायम दुनियाँ है
मैं उसी दुनियाँ में रहता हूँ
वक़्त धार की तीव्र धार में
बिना मन के मैं बहता हूँ
फिर बहते -बहते ख़्वाबों के
अथाह समंदर में मिलता हूँ
फ़टे पुराने सपनों को अपने
अब उम्मीदों से सिलता हूँ
काश के सूरज की छाया में
मेरे उम्मीद की कली खिले
मुझे मुझतक पहुंचाने वाली
मन के अंदर की गली मिले
सुबह में मुरझा जाता हूँ मैं
मैं अक्सर रात में खिलता हूँ
फ़टे पुराने सपनों को अपने
अब उम्मीदों से सिलता हूँ
आशातीत सफलता अब तो
दूर दिखाई देती है
मेरी किस्मत अब दूर से ही
मजबूर दिखाई देती है
ख़ुशी और गमों के बीच
मैं पेंडुलम सा हिलता हूँ
फ़टे पुराने सपनों को अपने
अब उम्मीदों से सिलता हूँ
-सिद्धार्थ गोरखपुरी


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







