दौड़त-दौड़त जग मिला, खुद से रहा अनजान।
पल भर भीतर झाँक ले, मिल जाएगा इंसान॥
मंज़िल पीछे भागता, राह गई अनजान।
ठहर ज़रा दो पल यहाँ, सुन मन की पहचान॥
जग को पाने की धुन में, खो बैठा निज चैन।
मन के भीतर लौटकर, खोज अपना नैन॥
दिनभर जग से बोलता, खुद से बोले कौन।
मौन हुआ तो सुन सके, अंतर का वह मौन॥
पाने को सब दौड़ते, खोते जीवन-रंग।
थमकर जिसने देख लिया, समझा जीवन-संग॥
राह कठिन हो, तेज हो, मन को दे विश्राम।
हर पल दौड़ जरूरी नहीं, ठहराव भी है काम॥
उम्र भर मिलते दुनिया से , खुद से मिलना शेष।
जिस दिन खुद को पा लिया, जीवन हुआ विशेष॥
डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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