तरसते रहे
आपके कहने से मुश्किल है बात तो है,
इश्क़ इरादे से कुछ हासिल नहीं बरसात तो है,
ध्यान दे अगर प्यास है बात तो है,
हम यहाँ तरसते रहे,
जो कुछ जुड़ा है वो धीरे-धीरे मिलते रहे,
जो नहीं मिलते नहीं मिलते ही मिलते ही नहीं,
हम उनके पास खड़े थे,
वो तरसते ही नहीं,
जो हमसे पूछते हैं,
एक तुमसे ताजा और कौन है,
ये प्यार तो है,
हम तरसते रहे,
बरसात आई,
भीगी ज़मीन महकी,
पेड़ों ने राहत की साँस ली,
लेकिन दिल की प्यास वैसी ही रही।
कुछ बारिशें मिट्टी को भिगोती हैं,
कुछ आँखों को,
और कुछ ऐसी होती हैं
जो बरसकर भी भीतर का सूखा नहीं भर पातीं।
लोग कहते रहे—भूल जाओ।
हमने पूछा—कैसे?
क्या कोई अपनी धड़कन को
सिर्फ़ इसलिए छोड़ देता है
कि उसकी आवाज़ सुनाई नहीं देती?
हम आज भी वहीं हैं,
बस आवाज़ देना छोड़ दिया है,
मोहब्बत करना नहीं छोड़ा,
मगर उसे जताना छोड़ दिया है।
जो किस्मत में होते हैं,
वो मिल ही जाते हैं,
और जो दिल में होते हैं,
वो कभी जाते ही नहीं।
वक़्त की मुट्ठियों से रेत-सा फिसलते रहे,
नाम होंठों पे रहा, हम मगर चुप ही रहे।
धूप ने जिस्म जलाया तो गिला भी न किया,
तेरी यादों की छाँव में उम्र भर पलते रहे।
नदियाँ समंदरों तक पहुँच भी गईं,
हम तेरी एक गली से निकलते ही नहीं।
कितनी सदियाँ गुज़र गईं ख़ुद को समझाते हुए,
दिल किसी और की चौखट पर सँभलते ही नहीं।
कभी सोचा था
तुम्हारे साथ उम्र गुज़रेगी,
अब सोचते हैं—
तुम्हारे बिना भी उम्र
कितनी लंबी चीज़ है।
वक़्त ने बहुत कुछ सिखाया,
मगर एक बात नहीं सिखा पाया—
जिसे दिल ने अपना मान लिया हो,
उसे पराया कैसे देखा जाता है।
हमने अपने हिस्से की धूप
चुपचाप रख ली,
किसी से छाँव माँगी नहीं।
क्योंकि माँगी हुई राहत में भी
कहीं न कहीं
उधार का एहसास रहता है।
कुछ लोग किताबों जैसे होते हैं,
पूरा पढ़ लो फिर भी
एक पन्ना अधूरा रह जाता है।
और वही अधूरा पन्ना
सबसे ज़्यादा याद रहता है।
तुम्हारे बारे में अब
किसी से बात नहीं करते,
क्योंकि कुछ किस्से
सुनाने के लिए नहीं होते,
सिर्फ़ उम्र भर उठाने के लिए होते हैं।
और देखो,
जो बात कभी कही नहीं गई,
वही सबसे ज़्यादा बची रही।
कहे हुए लफ़्ज़
उम्र के साथ पुराने हो जाते हैं,
अनकही बातें
समय से बाहर रहने लगती हैं।
अब अगर कोई पूछे,
मोहब्बत बची है?
तो कहूँगा—
नहीं,
मोहब्बत नहीं,
उसकी आदत बची है।
और आदतें,
इंसान से ज़्यादा लंबी उम्र जीती हैं।
पानी जब पत्थर पर गिरता है,
तो पत्थर नहीं बोलता,
मगर उसकी ख़ामोशी में
एक गड्ढा बन जाता है।
इंसान भी शायद
ऐसे ही टूटता है।
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने आईना कम देखा,
क्योंकि चेहरा बदलता नहीं था,
सवाल बदल जाते थे।
कुछ रिश्ते
पेड़ों पर नहीं उगते,
वे हवा में बने रहते हैं,
दिखते कहीं नहीं,
मगर साँस लेते वक़्त
उनका वज़न महसूस होता है।
मैंने एक रोज़
अपने ही नाम को पुकारा,
बहुत देर तक
कोई जवाब नहीं आया।
तब समझ में आया,
इंसान सबसे पहले
अपने भीतर से गुम होता है।
तुम्हें पाने की हसरत
अब उतनी नहीं रही,
मगर यह अजीब आदत
अब भी बाक़ी है
कि कोई भी अच्छी ख़बर मिलती है
तो सबसे पहले
तुम्हारा ख़याल आता है।
हमने कई बार
अपने हिस्से की ख़ामोशी नापी,
हर बार उसका क़द
हमसे थोड़ा बड़ा निकला।
तुम्हारे बाद
घर वैसा ही रहा,
बस दीवारों ने
एक-दूसरे से बात करना छोड़ दिया।
जो लोग कहते हैं
वक़्त सब बदल देता है,
शायद उन्होंने कभी
घड़ी की सुइयों को
एक ही जगह लौटते नहीं देखा।
मैंने तुम्हें भूलने के लिए
तुम्हारा नाम नहीं छोड़ा,
मैंने उन रास्तों पर चलना छोड़ दिया
जहाँ हवा भी
तुम्हारी तरफ़ से आती थी।
अजब बात है,
जिसे हम अपना आख़िरी दुख समझते रहे,
वही आगे चलकर
बाक़ी सारे दुखों का पैमाना निकला।
हमने पानी को देर तक देखा,
वो हर बर्तन का हो गया,
बस प्यास का नहीं हुआ।
तेरा न होना
तेरे जाने से नहीं आया,
तू तो वहीं था,
जहाँ से मेरा होना लौट गया।
मैंने एक दिन
अपनी परछाई उतारकर रख दी,
धूप बहुत देर तक
मुझे पहचानती रही।
तुम्हें खोना
वैसा नहीं था
जैसे कोई आदमी रास्ता खो दे,
तुम्हें खोना ऐसा था
जैसे रास्ता ही
चलने वाले को भूल जाए।
हम दोनों के बीच
बस एक ख़ामोशी थी,
और अजीब बात,
उसी ने सबसे ज़्यादा बातें कीं।
तुमसे मिलने की ख़्वाहिश
अब वैसी नहीं रही,
अब तो डर यही है,
कहीं मिलकर
तुम भी याद न बन जाओ।
ये कैसी तदबीर थी,
कि तदबीर से कुछ न बना,
तक़दीर ने भी
हाथ खींच लिए,
और हम अपने ही सब्र की
मज़ार पर चराग़ जलाते रहे।
कहते हैं,
हर दर्द का एक आख़िरी किनारा होता है,
मगर हमने देखा है—
कुछ दर्द दरिया नहीं होते,
रेगिस्तान होते हैं;
चलते जाओ,
प्यास साथ चलती रहती है।
अब अगर कोई पूछे—
क्या हासिल हुआ?
तो इतना ही कहेंगे—
दिल ज़ख़्मी हुआ,
रूह रोशन हुई,
और इंसान होना
पहली बार समझ में आया।
अजीब बात है,
तेरे बाद किसी की कमी नहीं लगी,
बस किसी की मौजूदगी
काम नहीं आई।
तू अगर नदी था,
तो हम किनारा भी नहीं थे,
हम वो पत्थर थे
जिसे बहते हुए पानी ने भी
अपना नहीं कहा।
जो नहीं टूटता,
वो आवाज़ नहीं करता,
हम भी बरसों से सलामत हैं,
इसलिए शायद कोई सुनता नहीं।
अब जो मिलता है, मुस्कुराकर चला जाता है,
कोई अपना भी अजनबी-सा नज़र आता है।
हमने खोया है जिसे, वो नहीं मिलता फिर,
जो नहीं मिलता, वही सबसे ज़्यादा याद आता है।
साँस चलती रही, दिल भी धड़कता ही रहा,
एक वीरान-सा मौसम मगर रहता ही रहा।
तेरी आहट की तरफ़ उम्र झुकी रहती है,
कोई दरवाज़ा हमारे लिए खुलता ही नहीं।
हमने मिट्टी में कई ख़्वाब दबाकर देखे,
फिर उन्हीं ख़्वाबों को बारिश में उभरते देखा।
इश्क़ मरता नहीं, बस रूप बदल लेता है,
हमने हर दर्द को चुपचाप निखरते देखा।
अब अगर मिल भी जाओ तो वही बात कहाँ,
वो पहली-सी तड़प, पहली मुलाक़ात कहाँ।
उम्र ने दिल पे कई और इबारत लिख दी,
फिर भी तेरे ही नाम की शुरुआत वहाँ।
फूल शाख़ों से बिछड़कर भी महक रखते हैं,
कुछ रिश्ते टूटकर भी असर रखते हैं।
तू मुकद्दर में नहीं था तो शिकायत कैसी,
हम दुआओँ में मगर तेरा सफ़र रखते हैं।
दर्द जब हद से गुज़रा तो सदा बन बैठा,
इश्क़ जब दिल में उतरा तो ख़ुदा बन बैठा।
हमने चाहा भी नहीं नाम ज़माने भर में,
तेरा होना ही हमारे लिए जहाँ बन बैठा।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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