हक़ीक़त की ज़मीं पर तो सिर्फ़ ज़ख़्मों का डेरा है,
मगर दावों की महफ़िल में कहा जाता सवेरा है।
ज़मीर सो गया है और इंसानियत भी बेदम है,
यहाँ हर सम्त में फैला हुआ बस ग़म का घेरा है...
हाँ! बस ग़म का घेरा है!
मिला कर ख़ाक में ख़ुद को, ये कैसा चैन पाते हैं?
ख़रीद कर ज़हर हाथों से, ये किस दुनिया में जाते हैं?
ये किस दुनिया में जाते हैं? हाँ, किस दुनिया में जाते हैं?
वो शीशी और वो धुआँ तो महज़ इक जाल है साहिब,
मगर इस जाल में फँस कर ज़माने तूट जाते हैं!
सहर की चाह में जो रात के अंधेरे में उतरे,
वो अपने हाथ से अपनी ही रूह को जलाते हैं!
दुहाई है दुहाई है! ये कैसी धुंध छाई है!
दवा बेअसर हुई है और दुआ ने पीठ दिखाई है!
गली-गली में सन्नाटा है, हर इक शहर सूना है,
ये पत्थर-दिली का नशा तो दिन-ब-दिन दूना है!
दिन-ब-दिन दूना है, हाँ दिन-ब-दिन दूना है!
कोई तड़पे, कोई चीख़े, किसी को फ़र्क़ नही पड़ता,
इंसानियत का चेहरा आज हर कूचे में रोना है!
तमाशा देखने वाले तो चुपचाप खड़े हैं सब,
किसी की आँख का पानी अब यहाँ कहाँ नम होना है!
वो काग़ज़ पर तरक़्क़ी का बड़ा ढिंढोरा पीटते हैं,
मगर सड़कों पे भूखे बच्चे धूल चाटते हैं!
धूल चाटते हैं!
हाँ, धूल चाटते हैं!हमें नारे नहीं चाहिए,
हमें वादे नहीं चाहिए,
जो भूखे पेट का सच है,
वो सच हमको दिखाइए!
अंधेरी कोठरी में बंद है सच्चाई जो बरसों से,
उसे अब आसमाँ पर नूर बन कर चमकाइए!
हुकूमत नींद में है और अवाम बेज़ार बैठी है,
मसीहा बन के आए थे जो,
उनकी नीयत सोई बैठी है!
मगर इस पावन मिट्टी को अब तो जागना होगा,
अंधेरे को हरा कर एक नया दिन लाना होगा!
हाँ! एक नया दिन लाना होगा!
नया सवेरा जगाना होगा!
पुकारता है यही दर्द आज 'ललित' महफ़िल में,
कि नई नस्ल को इस नशे के दलदल से बचाना होगा!
इस देश की मिट्टी को अब आज़ाद कराना होगा!
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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