प्रस्तुत है---
भाई अशोक पचौरी 'आर्द्र "जी की वो रचना जो
जाने से पहले मात्र 15 दिन पहले ही उनके द्वारा लिखी गईं थी !!
"माटी का वह दीपक जब, स्नेह सुधा से भरे,
छोटे तन में ज्योति बड़ी, अंधकार से लड़े।"
इस पंक्ति को जब मैंने गौर किया तो पाया कि..वो दिवाली के समय कितने कष्ट में थे !!
(माटी का वो दीपक जब..)
खुद को बोल रहे थे अशोक भाई ..
(स्नेह सुधा से भरे)
अपने परिवार को वो निहार रहे थे !!
(छोटे तन में ज्योति बड़ी)
अपने कष्ट को वो बयां कर रहे थे !!
(अंधकार से लड़े )
वो स्वयं लड़ रहे थे !!
💫 इस रचना से ये साबित होता है कि एक लेखक, कवि अथवा रचनाकार अपनी बातों को अपनी रचना में कहीं न कहीं फ़ूलों के समान एक धागे में ..अपनी रचना में पिरो ही देता है ..एक माले के समान !!
प्रस्तुत है ये महान रचना....
उस महान दिव्यात्मा को स्नेहांजली...... !!
दीप जले, मन बोले, उजियारा हर द्वारे,
तमस मिटे, नव चेतन जगे, सुख के सागर धारे।
माटी का वह दीपक जब, स्नेह सुधा से भरे,
छोटे तन में ज्योति बड़ी, अंधकार से लड़े।
फूलों जैसी मुस्कानें हों, हर मन में अनुराग,
मिलजुल कर सब बाँटें प्रेम, भूलें मन का दाग।
माँ लक्ष्मी के चरण पड़े, घर आँगन में आज,
सौभाग्य सुमन खिले नित्य, शुभ हो हर एक काज।
फुलझड़ियाँ हँसतीं नभ में, जैसे तारे नाचें,
मन की वीणा झनक उठे, जब दीप दिये जागें।
लोभ, द्वेष, कलुष जल जाएँ, सच्चे दीपक संग,
मानवता की लौ जले, प्रेम बने हर रंग।
दीप जले, मन बोले, प्रकाश अमर हो जाए,
हर हृदय में दीपावली, हर दिन उजियारा छाए।
===💐 अशोक कुमार पचौरी ' आर्द्र ' 💐
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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