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Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

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The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

स्नेहांजली

प्रस्तुत है---
भाई अशोक पचौरी 'आर्द्र "जी की वो रचना जो
जाने से पहले मात्र 15 दिन पहले ही उनके द्वारा लिखी गईं थी !!


"माटी का वह दीपक जब, स्नेह सुधा से भरे,
छोटे तन में ज्योति बड़ी, अंधकार से लड़े।"


इस पंक्ति को जब मैंने गौर किया तो पाया कि..वो दिवाली के समय कितने कष्ट में थे !!

(माटी का वो दीपक जब..)
खुद को बोल रहे थे अशोक भाई ..


(स्नेह सुधा से भरे)
अपने परिवार को वो निहार रहे थे !!


(छोटे तन में ज्योति बड़ी)
अपने कष्ट को वो बयां कर रहे थे !!


(अंधकार से लड़े )
वो स्वयं लड़ रहे थे !!


💫 इस रचना से ये साबित होता है कि एक लेखक, कवि अथवा रचनाकार अपनी बातों को अपनी रचना में कहीं न कहीं फ़ूलों के समान एक धागे में ..अपनी रचना में पिरो ही देता है ..एक माले के समान !!
प्रस्तुत है ये महान रचना....
उस महान दिव्यात्मा को स्नेहांजली...... !!



दीप जले, मन बोले, उजियारा हर द्वारे,
तमस मिटे, नव चेतन जगे, सुख के सागर धारे।

माटी का वह दीपक जब, स्नेह सुधा से भरे,
छोटे तन में ज्योति बड़ी, अंधकार से लड़े।

फूलों जैसी मुस्कानें हों, हर मन में अनुराग,
मिलजुल कर सब बाँटें प्रेम, भूलें मन का दाग।

माँ लक्ष्मी के चरण पड़े, घर आँगन में आज,
सौभाग्य सुमन खिले नित्य, शुभ हो हर एक काज।

फुलझड़ियाँ हँसतीं नभ में, जैसे तारे नाचें,
मन की वीणा झनक उठे, जब दीप दिये जागें।

लोभ, द्वेष, कलुष जल जाएँ, सच्चे दीपक संग,
मानवता की लौ जले, प्रेम बने हर रंग।

दीप जले, मन बोले, प्रकाश अमर हो जाए,
हर हृदय में दीपावली, हर दिन उजियारा छाए।

===💐 अशोक कुमार पचौरी ' आर्द्र ' 💐


यह रचना, रचनाकार के
सर्वाधिकार अधीन है


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रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (5)

+

वन्दना सूद said

बहुत सही कहा आपने कि अपने आप से लड़ रहे थे।हर पंक्ति हृदयस्पर्शी है

शिवचरण दास said

अदब की महफ़िल का अजीम तारा था
अपने आप से लड़ता अशोक प्यारा था
अश्क़ आते हैं बहुत उसको याद करके
इसलिए खुदा ने‘आर्द्र ' नाम उतारा था !


रीना कुमारी प्रजापत said

क्या कहूं मैं उनके लिए लफ़्ज़ बहुत है मगर ज़ुबान खामोश है......🥺🙏🙏

सरिता पाठक said

अशोक जी की अंतिम समय की पीड़ा उनकी रचना मे झलक रही है, आप अपनी रचनाओं मे हम सब के ह्रदय मे सदैव जीवित रहेंगे, आपको शत शत नमन 🙏🙏

सुभाष कुमार यादव said

एक श्रेष्ठ रचनाकार की यही विशेषता है। 🙏🙏

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