मेरी ख़ातिर तो अब भी हैं, ज़मीं पे सितारे मौजू..
आंखों में धुँआ नहीं, और दिल में है अंगारे मौजू..
सहरा नहीं हुई है अब भी, मेरे दिल की ज़मीं दोस्तों..
घटाएं न सही, मगर फ़ज़ाँ-ए-दिल में हैं बहारें मौजू..।
किसी बिना पे उम्मीदें बची हुई हैं, अब भी दूर क्षितिज में..
किसकी दुवाओं से, धुंधले सायों में भी है रंगी नज़ारे मौजू..
झील का बदन भी थरथराता है, गुज़रे वक्त की मौज़ में..
है उसके सीने पे, अंजाम-ए-मुहब्बत लिए शिकारे मौजू..।
इस तरह तो सूख जायेंगे, हजारों आंखों के समंदर भी..
न हद-ए-फ़लक मालूम है, न ज़मीं के किनारे मौजू..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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