सिर्फ स्त्री के पास प्रेम है,
और वही प्रेम रुपांतरित होकर ममत्व, स्त्री आकर्षण, यौवन अवस्था का प्यार, पत्नी प्रेम और बहन के नटखट लगाव,
के रूप में जगत की मर्यादा में नज़र आता है,
इसलिए प्रेम कभी भी पुरुष के पास नहीं प्राप्त नहीं होता है,
स्त्री सिर्फ प्रेम के क्षेत्र से ही समझी जा सकती है,
इस प्रेम को जो नींव प्रदान करती है वो शक्ति है,
और शक्ति भी सिर्फ स्त्री के पास है,
अतः कोई भी पुरुष रूपी इंसान स्त्री के समक्ष शक्ति प्रदर्शन ना करें,
पर स्त्री सोच नहीं सकती है,
क्योंकि प्रेम और शक्ति के कारण उसे केवल कोमलता और कठोरता नज़र आएगी,
और सोचा हमेशा इसके बीच में जाता,
स्त्री को संतुलित कोई नहीं रख सकता है,
न वो खुद हो सकती है,
पर स्त्री किसी भी कार्य को तीव्र गति से कर सकती वो भी कार्य को सफल भी वो ही कर सकती है,
पुरुष के पास शांति है,
पुरुष ही सोच सकता है,
वो संतुलित है,
पर उसके पास अथाह खालीपन है,
वो अकेला ही है और रहेगा,
वो बदलाव कर सकता है,
पर मूल से हमेशा दूर है,
मूल हमेशा स्त्री और पुरुष सहयोग से पैदा होता है,
मूल सभी जगह नहीं है,
मूल वहीं है जहाँ आप नहीं है,
मूल स्थान बदलता है,
स्त्री और पुरुष के साथ रहने पर वो किसी भी स्थिति को कभी समझ नहीं पाएंगे,
पुरुष सबकुछ जान सकता है,
पर स्त्री पुरुष को जानती है,
स्त्री कमजोर रहती ताकि वो प्रेम के रूप में रहें,
लेकिन अगर स्त्री अपनी शक्ति बढ़ा दें तो पुरुष के लिए घातक है या कहे कि स्त्री के समक्ष मूल भी मिट सकता है,
अतः पुरुष और स्त्री ये दोनों अलग-अलग है,
एक शरीर में पुरुष बाहर है और स्त्री भीतर है,
ये संयोजन मूल पैदा करता है,
पर मूल तो वो दोनों स्त्री और पुरुष हैं,
इस मूल का कोई अस्तित्व नहीं है,
ये तो बस दोनों का संयोजन है,
ताकि संतुलन में कुछ नज़र आए।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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