जेठ दुपहरी में
बरगद की छांव सी
बाहें मेरी मां की
मलती शीतलाती है,
आंखों में ममता की
सागर की लहरें हैं
सींच सींच बूंद बूंद
तन-मन सहलाती है
मां की आवाज में
स्वर्ण किरण भोर की
रोज सुबह सुबह मुझे
नींद से जगाती है
चंद्रमा की चांदनी
उंगलियां हथेलियां
माथे पर संवार दे तो
थकन चली जाती है
ओंस की महीन बूंद
झिड़की और डांट डपट
छूते ही तन को
अंदर तक जाती है
मां की उदासी में
सूरज के सात रंग
पढ़ना अगर चाहूं भी
पढ़ी नहीं जाती है।।
( आज की कविता में उपमेय और उपमान तर्क संगत लगते नहीं,पर हैं तर्क संगत। जैसे - ओंस की बूंद शांति, शीतलता,कोमल एहसासों के लिए लिखी जाती है। परंतु जिस प्रकार ओंस की बूंदें तन पर पड़ते ही अंदर तक कंपकंपा देती हैं,उसी प्रकार मां की डांट सुनते ही बातें मन के अंदर तक चली आती है। यही कविता का भाव सौंदर्य है)🙏🙏🙏
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







