घटाओं के काली काली
झूलती लहराती पर्दे हटाकर,
दिनकर झांक लेते हैं
धरती को नजरें बचाकर
हवाएं फिर से इन पर्दों को
यथावत सजा देतीं है
छिपा लेते हैं फिर से कहीं
स्वयं को दिनमणि दिवाकर।
सूरज खेला करते हैं,
धरती से ऐसी आंख मिचौली,
देख देख मन मुग्ध -मुग्ध
दोनों की मोहक हंसी ठिठोली
शीतल -मंद -पवन के झोंके
इनके बीच में करे शरारत
जैसे खेले भागे किशोर मन
गलबहियां कर चलें हमजोली।
दिन भर की ये मंद रौशनी
लगते मन को बड़ी मनभावन
सूक्ष्म - सूक्ष्म सी जल की बूंदें
करें पावस को मीठी -सुहावन
नैनों में नूतन हरितिमा की
छवि समायी जाती पल-पल
घर बैठे भी लगे सैर सा
छटा घटा की इतनी पावन।
धुली -नहाई हरियाली की
छवि समायी हुई नयन में
पत्ता पत्ता और डाली डाली
जैसे विचरें गीत- भवन में
फूलचूहकी, गौरैया,मैना
फूदक - फूदककर नाच रहें हैं
श्याम घटा हो गई मनोरमा
चैन भर गई है चितवन में।
सुबह -सुबह न लगे सुनहरी
सांझ - सांझ न लगे बादामी
भरी दुपहरी न चमक दमक
फिर भी शोभा लगे मनगामी
तृण -तृण भी हरित अधरों से
हंस रही है, मुस्करा रही है
नवबदरी की नव नव झुंड अब
खींच मन भई हृदगामी।।
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







