"माँ-सृष्टि की प्रथम गुरु"
जिसकी गोदी में सारा ब्रह्माण्ड समाया,
जिसकी आँखों में सागर-सा ममत्व लहराया।
जिसकी वाणी में वेदों-सी मधुरता घुली,
वह माँ है, जिसकी छाया में हर पीड़ा धुली।
नौ मास जिसने उदर में हमें पाला,
अपना रक्त देकर जीवन का दीप ज्वाला।
रात-रात भर जागी, नींद अपनी गँवाई,
हमारे सुख के लिए हर दुख हँसकर उठाई।
भूखी रहकर पहले हमें खिलाया,
आँसू पीकर होठों पर मुस्कान सजाया।
थपकी देकर हर डर को दूर भगाया,
अपने आँचल में सारा संसार बसाया।
तेरी ममता की कोई उपमा नहीं,
तेरे त्याग की कोई सीमा नहीं।
ईश्वर का रूप है तू धरती पर,
तेरे चरणों में ही चारों धाम हैं माँ।
रात-रात भर जागी, नींद अपनी गँवाई,
लोरी गाकर हर दुःस्वप्न से बचाई।
भूखी रहकर पहले हमें खिलाया,
फटे आँचल से हर आँसू पोंछा, सहलाया।
उँगली पकड़कर चलना हमें सिखाया,
गिरते समय सबसे पहले दौड़कर उठाया।
"अ" से "ज्ञ" तक का ज्ञान दिया,
संस्कारों का अमृत कलश पिलाया।
जब संसार ने पीठ दिखाई, ठुकराया,
माँ ने सीने से लगाकर अपनाया।
हार में भी जीत का मंत्र पढ़ाया,
आँचल की छाँव में स्वर्ग दिखाया।
बेटी की विदाई पर जो मौन रोई,
बेटे की सफलता पर जो फूली न समाई।
दुआओं में जिसका नाम सबसे पहले आए,
वह माँ है, जो हर पल संग निभाए।
तेरी सेवा ही सच्ची पूजा है,
तेरा आशीष ही सबसे बड़ी दुआ है।
जन्म-जन्मांतर मिले तेरा साथ माँ,
यही हर बार ईश्वर से फरियाद है।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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