समय खुद ही कतर देता है अपने पंख,
आगे निकलकर,
फिर उस पल ऊंचाई भी ज़मीं पर आ जाती,
अपनी जगह से उठना,
आगे बढ़ना निकलना,
ऊँचाई देता है,
पर फिर वहीं से और आगे निकलना,
उस पल के वश में नहीं है,
वो तो अगले पल ही होता,
जब ऊँचाई वाला फिर ज़मीं पे होता है,
मुसाफिर ज़मीं पे ही होता है,
पर आगे निकलता है,
ऊँचाईं भी चढ़ता है,
बढ़ता है पर,
आराम फिर ज़मीं पे ही करता है,
जब भी,
आगे बढ़ेगा,
ज़मीं से ही बढ़ेगा,
सुबह जैसे जागती है,
दौड़ भाग धूप,
ऊर्जा की अथाह मात्रा में,
हर काम होते हैं,
पर रात में निकलते वक्त,
नींद में फिर ज़मीं पर आते हैं,
अतः ऊँचाई है दूरी है,
पर ज़मीं से,
नहीं होती है,
तन्हाई,
वो तो जहां के,
कोने और समंदर में,
घुली है,
कहाँ,
ऊँचाई जो बिजली पार ना कर सके,
विमान के बिना,
मनुष्य सहारे से ही,
हर ऊंचाई पर है,
वो ज़मीं के सभी प्राणी,
उन्हें भुला नहीं सकते,
वो हमेशा ज़मीं के,
आधार है,
ऊँचाई पर आपके सहारे,
बाकी आप कौन,
जो मिट सकते,
बिना हवा पानी के।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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